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4 LAC RUPEES AND BAGHJI

ज्ञान दर्पण पर आपने " मित्र के विरह में कवि और विरह के दोहे" में पढ़ा कि अपने मित्र बाघजी राठौड़ की मौत का दुःख कविराज आसाजी बारहट सहन नहीं कर सके और वे उनके विरह में एक पागल की से हो गए वे जिधर भी देखते उन्हें बाघजी की सूरत ही नजर आती और वे बाघा बाघा चिल्लाते हुए उनके विरह में हो दोहे व कविताएँ बोलते रहे |
एक दिन कविराज आसाजी के बारे में अमरकोट के राणा जी ने सुना तो उन्होंने कहा कि कविराज को मैं अपने पास रखूँगा और उनका इतना ख्याल रखूँगा कि वे बाघजी को भूल जायेंगे | और आसाजी को राणा ने अमरकोट बुलवा लिया |
एक दिन राणा जी ने कविराज आसाजी की परीक्षा लेने के लिए सोचा कि क्यों न कविराज को लालच दिया जाय फिर देखते है वे अपने मित्र को भुला पते है या नहीं | यही सोचकर एक दिन राणा जी ने कहा कि आपके दोस्त बाघजी से मेरा पुराना बैर है और मैं चाहता हूँ कि आप कम से कम एक रात्री उनका नाम नहीं लें , राणा जी ने कविराज से कहा कि वे सिर्फ एक रात्री बाघजी का नाम न लें तो मैं आपको रात्रि के चारों प्रहरों के हिसाब से चार लाख रूपये इनाम दूंगा कह कर राणा वहां उपस्थित सिपाहियों को इशारा करके चले गए |
राणा की बात सुनकर कविराज के पुत्र ने उन्हें खूब समझाया कि हे पिता श्री ! कम से कम एक रात तो आप मेरे ही लिए अपने मित्र बाघजी को भूल जाये और एक रात्रि उनका नाम लिए बिना काट दें | ताकि मैं इन मिलने वाले चार लाख रुपयों से अपना जीवन ढंग से काट लूँ आखिर एक ही रात की बात है फिर भले आप रोजाना अपने मित्र बाघा को याद करते रहना | कवि आसाजी ने अपने पुत्र की विशेष इच्छा पर हृदय पर पत्थर रखकर कुछ रात्री निकाली | पर सच्चे प्रेमी जब बिछुड़ते है तो उन्हें नींद आना भी तो कठिन है | एक प्रहर रात के बीतते ही अपने मित्र बाघजी की यादें शूल की भांति कवि आसाजी के हृदय को भेदने लगी | और इतनी देर से दबा हुआ भावों का प्रवाह पुन: तीव्र हो गया और वे आखिर बोल पड़े -

बाघा आव वलेह, धर कोटडै तूं धणी |
जासी फूल झड़ेह, वास न जासी बाघरी ||


हे कोटडे के स्वामी बाघजी ! एक बार फिर आ जावो फूल झड़ जाते है लेकिन उनकी सुगंध नहीं जाती (तुम्हारी कीर्ति भुलाई नहीं जा सकती)|

'बाघा आव वलेह' कितना मीठा निमंत्रण है | 'वास न जासी बाघरी' वास्तव में ठीक है कि प्रेमी की स्मृति प्रेमी की मृत्यु होने पर मिट थोड़े ही सकती है | वह तो उल्टी और तीव्र होगी | कवि ने अनुभूति का पुट देकर जीवन के इस महान सत्य को कितने थोड़े शब्दों में किस कौशल से व्यक्त कर किया है |

इस दोहे को सुनकर सिपाही ने पूछा कि आसाजी जाग रहे हो या नींद में कह रहे हो | कवि ने कहा - मित्र बाघजी बिना नींद ही नहीं आती और एक नि:श्वास खींचते हुए कहा-

ठोड़ ठोड़ पग दौड़ करस्यां पेटज कारणे |
रात दिवस राठौड़ वीसरसूं नह बाघ नै ||

पेट के लिए जगह जगह भटकता फिरूंगा लेकिन मित्र बाघजी को कभी भी न फूल सकूँगा |

सिपाही ने कहा - अपनी मस्ती में अपने पुत्र पर हृदय-हीनता क्यों करते है ? दो लाख रूपये तो आपने बाघजी के लिए दो दोहे बोलकर खो दिए अब भी समय है दो लाख तो बचाइये | सिपाही की बात सुनकर कविराज आसाजी गंभीर हो चुप हो गए |

लेकिन दबी हुई प्रेमी की विकल हूक दबी कैसे रह सकती थी | तीसरे प्रहर का प्रभात होते मुर्गा बोला | प्रभात के शांत वातावरण में हृदय के समस्त वेग से मुर्गे के उस दुखी क्रन्दन में क्या भाव होते है यह एक विरही ही बता सकता है | कविराज के हृदय का प्रसुप्त प्रवाह विकल हुआ और बह उठा -
कूकड़ला क्यों कूकियो, ढळती मांझल रात |
(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग ||

हे मुर्गे ! तू इस बीतती हुई निस्तब्ध रात्री में क्योंकर क्रन्दन कर उठा ? क्या तुझे बिल्ली ने सताया है अथवा तुझे भी मेरी ही भांति बाघजी का विरह सता रहा है ?

कवि आसाजी मुर्गे के चिल्लाने में अपने दर्द की हुक पाते है '(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग ' कितना भोला प्रश्न है | इस प्रश्न में एक कसक है | कहते है कसक का स्पष्टीकरण ही काव्य है | इस दोहे के समान कसक का इतना अच्छा स्पष्टीकरण और कहाँ पाया जा सकता है |

सिपाही ने सोचा,इस समय याद दिला दिया तो कविराज का बचा हुआ एक लाख रुपया भी चला जायेगा | अत: प्रात:काल से कुछ पहले सिपाही ने कविराज से कहा - अब तो केवल आध घड़ी ही बची है सो धीरज रखिये इतने महाराणा भी आ जायेंगे और बचा हुआ एक लाख रुपया तो मिल जायेगा | कविराज आसाजी का प्रेम इसी समय माया पर विजय स्थापना कर गर्व से खड़ा हुआ | मन ही मन अपनी कमजोरी पर रोष करते हुए सिपाही से कहा -
थडै मसांण थयांह , आतम पद पूगां अलख |
(म्हारा) गंगा हाड़ गयांह ,(हूँ) वीसरसूं जद बाघ नै ||

मैं मित्र बाघजी को तभी भूल सकूँगा जब मेरा श्मशान भी बाघजी के स्मारक के पास ही बना दिया जावेगा,मेरी आत्मा परम पद को प्राप्त हो जाएगी और मेरी हड्डियाँ गंगा में प्रवाहित कर दी जाएगी |

सिपाही ने कहा - गजब कर दिया | आपने चारों लाख रूपये खो दिए | इतने में महाराणा भी आ गए और पूछा कि क्या बारहट जी चारों लाख रूपये खो चुके ? ऐसे प्रश्न का भावुक कवि ने उतर दिया -
मड़ा मसांण गयांह, अलल ले पोंछ्या अलख |
(म्मारा) गंगा हाड़ गयांह (हूँ) तोय न भूलूं बाघ नै ||

मेरा शव श्मशान भूमि को पहुँच जावेगा ,मेरी आत्मा स्वर्ग दूत ले जावेंगे और मेरी हड्डियाँ गंगा में बहा दी जावेगी; तब भी मैं बाघजी को नहीं भूल सकता |

कवि ने इस दोहे में अपनी प्रतिभा और अपने व्यक्तित्व की पराकाष्ठा कर दी | भावुकता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया "(हूँ) तोय न भूलूं बाघ नै" एक तीर सा प्रभाव करता है | यह वह काव्य है जिसे सुनकर 'तन मन धुनत शरीर' की उक्ति ठीक बैठती है | उस धनुर्धर के तीर से क्या और कवि की उक्ति से क्या,जो लगकर हृदय को तिलमिला न दे |
चींघण चालवियांह, खीरां बाळ खखेरियां |
राणा राख यथांह , वीसरसूं न बाघ नै ||

चींघण से (मुर्दा जलाते समय खोपड़ी तोड़ने वाली लकड़ी से) जब कपाल क्रिया कर दी जावेगी और अंगारों में मुझे जलाकर उथलाया जावेगा तब भी मैं बाघे को नहीं भूल सकूँगा | इसलिए हे राणा ! अपनी थैलियों को अपने पास रखो |

प्रेमी की प्रेम स्मृति के आगे रुपयों का लोभ नहीं टिक सका | इसीलिए तो कहा है "राणा राख यथांह" | यहाँ राणा को भी उपेक्षा भरी दृष्टि से देखा गया है | अपनी थैलियाँ अपने पास रखो, मुझे नहीं चाहिए - मैं बाघे को नहीं भूल सकता | कितनी आहें भरी हुई है इस कथन में |
और उस ज़माने में (हुमायूं के समकालीन) चार लाख रूपये का लालच भी उन कविराज आसाजी बारहट को अपने मित्र बाघजी की स्मृति को भुला न सका |

उपरोक्त सभी दोहों का हिंदी भावार्थ व उनकी व्याख्या पूज्य स्व.श्री तनसिंह जी,बाड़मेर द्वारा की गयी है |

 
 

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